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Saturday, March 21, 2026

फिर नयी चौखट बनाने लग गई है आरज़ू

फिर नयी चौखट बनाने लग गई है आरज़ू 
मेरा ख़स्ता घर सजाने लग गई है आरज़ू 

मैं अकेला रह गया था ज़िंदगी के दश्त में
दौड़ कर फिर मेरे शाने लग गई है आरज़ू 

जैसे जैसे गहरी होती जा रही है ख़ामुशी 
उतना ही ज़ोरों से गाने लग गई है आरज़ू 

किस तरफ़ ले जायेगी मुझको न जाने राहे-शौक़ 
अब मेरी धड़कन बढ़ाने लग गई है आरज़ू 

मुझमें सहरा के अलावा कुछ नहीं है फिर भी क्यूँ 
मेरे अंदर ख़ाक उड़ाने लग गई है आरज़ू 

इब्तिदा से ही न था इस टूटे दिल कुछ इलाज
आज क्यों आँसू बहाने लग गई है आरज़ू 

अब किसी भी ख़त का मेरे वो नहीं देता जवाब 
सो पुराना ख़त जलाने लग गई है आरज़ू 

दो कदम ही तो चला था रहगुज़र पर दूसरी
देखिए वापस बुलाने लग गई है आरज़ू 

कितने आलम बन के दिल में टूट जाते हैं "दिनेश"
क्यों ग़ज़ब का हश्र ढाने लग गई है आरज़ू

Monday, March 2, 2026

रोने वाली आँखें देख के हँसता था

रोने   वाली  आँखें  देख  के  हँसता था
मंदिर   के   बाहर   जो  साधू  बैठा  था

अपनी  मस्ती   में  सर  फोड़ा  है  हमने
इस  दीवार को फांदा भी जा सकता था

हम  फ़रियादी  लोग हैं साहब छोड़ो भी
हमने  बेध्यानी  में  तुम  को  पुकारा  था

अब   दुनिया  के आगे  नाक  रगड़ता हूँ
मेरे    आगे   दश्त   रगड़ता   था   माथा

बात    मुकम्मल  कैसे   हो   पाती  मेरी
मेरा  सानी   मिसरा   इतना  अच्छा  था

सहरा   आकर  सारी   ग़फ़लत  दूर  हुई
जाने  मैं  किस धुन में घर से निकला था

बस   मेरे   अंदर   फैली   थी   तारीकी
रोशन   मेरे   घर  का  कोना  कोना  था

खुश  तो लगती थी जब मिलने आई थी
फिर क्यूँ उसकी आँख का काजल फैला था

दिल  बहला के आख़िर लौट आया मैं ‘दिनेश’
उस  महफ़िल  में  केवल मैं ही तन्हा था

रात मेरे ख़ाबों ने गांजा फूँका था

सारा मंज़र मोम के जैसा पिघला था
सूरज मेरी आँख में आ कर डूबा था

ख़ाब का पस मेरी दुनिया में आता था
चाँद  मेरी  आँखों  का  कोई फोड़ा था

सुबह तो अच्छी क्लास लगाने वाली है
रात  मेरे   ख़ाबों  ने  गांजा  फूँका   था

क्या है इस दुनिया में मिलने के इमकान
मेरा  हिज्र में  मिट जाना इक तुक्का था

बीनाई  का  बल्ब  बुझाने  की   थी  देर
“रोशन   मेरे   घर  का  कोना-कोना था “

सिर्फ़  तुम्हारी  तस्वीरें  ही  मिल  पायीं
ग़म   ने  मेरे  दिल  पे  छापा  मारा  था

फ़र्श  पे  मेरे  बैंक  के  काग़ज़ बिखरे थे
छत  से  मेरे  ख़्वाब का चेहरा लटका था

बस  कम्बल  दे पाया  अपने  बच्चे  को
मेरी   जान  से  महँगा घर  का भाड़ा था

गाँव की सड़कें आज भी पाँव से लिपटी हैं
वो क्या दिन थे जब सब से मिल पाता था

हर  किरदार  कहानी  का खुश रहता  है
ऐसी     गूँथी    है    हमने   जीवन-गाथा

नहीं होता है कुछ नालाकशी से

मेरी हर वक़्त की नौहागरी से
ये दुनिया भर गयी है ख़ामुशी से

तुम अपने दिल को बहलाओ मेरे दोस्त
बहुत ख़ुश हूँ मैं अपनी नाख़ुशी से

वही कुछ अनकही बातों का मातम
‘मैं आजिज़ आ गया हूँ शायरी से’

हमेशा ज़िन्दगी का रोना-रोना
तो डर क्यों लग रहा है ख़ुदकुशी से

निकल आता है क्यों ज़हरे-तमन्ना
गुज़िश्ता वक़्त की इस केंचुली से

नदी सहरा में हो जाती है ग़र्क़ाब
नहीं होता है कुछ नालाकशी से

मेरी आँखें उफ़क़ को चूमतीं हैं
समन्दर वस्ल करता है नदी से

मैं तेरी ओर बढ़ता जा रहा हूँ
ये काँटे लग रहे हैं पंखुड़ी से

मैं दीवारें गिराता जा रहा हूँ
ख़फ़ा हैं सब मेरी घर-वापसी से

मेरी आवाज़ अन्दर दब गयी है
गले तक भर गया हूँ बेबसी से

नहीं दुखता है अब हर बात पे दिल
मैं रोता हूँ मगर अपनी ख़ुशी से

मेरे ख़्वाबों की दिल-आवेज़ दुनिया
नहीं बन पायेगी दस्ते-तही से

ये दुनिया सड़ रही है रफ़्ता-रफ़्ता
दिलों में हिर्स की आलूदगी से

दिनेश नायडू

मैं हँस रहा हूँ मेरी जाँ ..कमाल है मेरा

मैं हँस रहा हूँ मेरी जाँ ..कमाल है मेरा
वगरना इश्क़ में जीना मुहाल है मेरा

तेरी तलब तेरे चेहरे में ढल गई है अब 
ये हिज्र.. हिज्र नहीं है विसाल है मेरा 

कभी कभार मेरा हाल पूछ लेते हो
बस एक तुम हो कि जिसको ख़याल है मेरा 

मैं जंग जीत चुका हूँ फ़ुज़ूल ख़ाबों से 
ग़मे-हयात ग़नीमत का माल है मेरा 

हर एक फ़र्द मेरे आँसुओं में रोता है 
तमाम दहर पे रंगे-मलाल है मेरा

तेरे बग़ैर गुज़रता है कैसे इक इक पल 
मैं क्या बताऊँ की अब जी निढाल है मेरा

तमाम दोस्त जुदा हो गये इक इक कर के 
मेरा उरूज ही शायद जवाल है मेरा 

जवाब दे दिया फ़ौरन मुझे 'दिनेश' मगर 
सुना किसी ने नहीं जो सवाल है मेरा

जी मचलता है तो कुछ देर में रुक भी गया है

जी मचलता है तो कुछ देर में रुक भी गया है
ख़ाब फिर आ के तेरा, ज़ख्म मेरा सी गया है 

घाव दिल का तो हरा है मगर आंखें सूखीं 
सारे अश्कों को मेरा ज़ख्मे-कुहन पी गया है

सर्दियों में मेरी धड़कन को जमा दे न कहीं 
दिल के गोशे में जो बरसात का पानी गया है

उनके आने की ख़बर सुन के मेरा पागल दिल 
इक ही पल कई सदियों की ख़ुशी जी गया है 

जा ब जा दह्र में बिखरा हुआ है गर्दो ग़ुबार 
ख़ाक उड़ाता हुआ आकाश का वासी गया है 

ढूंढ कर देख लिया दश्त का कोना कोना 
क्या पता कौन सी मंज़िल तेरा राही गया है 

अभी तो फ़ासला तय करना है जन्मों का हमें 
अभी तो दर्द तेरा रूह तलक ही गया है 

सोच के डूबने लगता है ख़ला में मेरा मन 
हो के आज़ाद कहाँ जिस्म का क़ैदी गया है

Thursday, February 26, 2026

हर एक शक्ल पे मातम है क्या किया जाये

बड़ा अजीब सा आलम है क्या किया जाये
मिलन का आख़िरी मौसम है क्या किया जाये

अगर रुकी नहीं बारिश तो डूब जायेगा शहर
मगर ये दीदा-ए-पुर-नम है क्या किया जाये

हर एक बात पर आती है अब हँसी मुझको
हयात इक ग़मे-पैहम है, क्या किया जाये 

तुम्हारे सामने मेरी अना का ये पर्दा
सफ़ेद रंग का परचम है क्या किया जाये

किसे दें दोष हम आवाज़ अपनी खोने का
ग़ज़ल हमारी ही मुब्हम है क्या किया जाये

कोई भी गा नहीं पाता है अब तराना-ए-इश्क़
दिलों का साज़ ही बेदम है क्या किया जाये

ज़रा भी काम नहीं आई मसख़री मेरी
हर एक शक्ल पे मातम है क्या किया जाये

जो घर से दूर निकल कर हुआ था ख़ुश वो शख़्स
‘अब अपने आपसे बरहम है क्या किया जाये’

मैं उसको याद नहीं करना चाहता हूँ ‘दिनेश’
मगर ये रात भी पूनम है क्या किया जाये

–दिनेश नायडू