पल-पल तेरे ध्यान में रहने वाला मैं
मौसम के ढब लिखने-पढ़ने वाला मैं
ख़ुद को ख़ुद ही शायर कहने वाला मैं
कुहरा जैसे तल्ख़ धुआँ हो सिगरेट का
और सहर के हाथ में जलने वाला मैं
रौनक़ का हर बिंब मिटाने वाली रात
घोर अंधेरा फिर भी चमकने वाला मैं
आख़िर तेरे दर पर आ कर बैठ गया
था दश्तो-सहरा में भटकने वाला मैं
लम्हा-लम्हा रंग बदलने वाला तू
लम्हा-लम्हा जुड़ने-बिखरने वाला मैं
देख नयी बातें भी करना सीख गया
सिर्फ़ तिरी ही बातें करने वाला मैं
तेरी याद दिलाने वाली सूनी शाम
और अकेले रोने-हँसने वाला मैं
सन्नाटे के होश उड़ाने वाली चीख़
क्या कर बैठा चुप-चुप रहने वाला मैं
दिनेश नायडू
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