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Monday, March 2, 2026

नहीं होता है कुछ नालाकशी से

मेरी हर वक़्त की नौहागरी से
ये दुनिया भर गयी है ख़ामुशी से

तुम अपने दिल को बहलाओ मेरे दोस्त
बहुत ख़ुश हूँ मैं अपनी नाख़ुशी से

वही कुछ अनकही बातों का मातम
‘मैं आजिज़ आ गया हूँ शायरी से’

हमेशा ज़िन्दगी का रोना-रोना
तो डर क्यों लग रहा है ख़ुदकुशी से

निकल आता है क्यों ज़हरे-तमन्ना
गुज़िश्ता वक़्त की इस केंचुली से

नदी सहरा में हो जाती है ग़र्क़ाब
नहीं होता है कुछ नालाकशी से

मेरी आँखें उफ़क़ को चूमतीं हैं
समन्दर वस्ल करता है नदी से

मैं तेरी ओर बढ़ता जा रहा हूँ
ये काँटे लग रहे हैं पंखुड़ी से

मैं दीवारें गिराता जा रहा हूँ
ख़फ़ा हैं सब मेरी घर-वापसी से

मेरी आवाज़ अन्दर दब गयी है
गले तक भर गया हूँ बेबसी से

नहीं दुखता है अब हर बात पे दिल
मैं रोता हूँ मगर अपनी ख़ुशी से

मेरे ख़्वाबों की दिल-आवेज़ दुनिया
नहीं बन पायेगी दस्ते-तही से

ये दुनिया सड़ रही है रफ़्ता-रफ़्ता
दिलों में हिर्स की आलूदगी से

दिनेश नायडू

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