हम अकेले हैं तेरे शहर में वहशत वाले
क्या हुआ उनको जो बंदे थे तेरे मतवाले
.
मेरे हर ख़ाब की तामीर नया ख़ाब ही थी
मैंने देखे ही नहीं ख़ाब हक़ीक़त वाले
.
मैं उसे रोक भी सकता था किसी सूरत से
कुछ इशारे तो कभी देता वो रुख़्सत वाले
.
फिर टटोलूंगा मैं ख़ाबों का पुलिंदा अपना
आज उलट दूंगा सभी बक्से तेरे ख़त वाले
.
आख़िरश मैंने ख़राबों की तरफ कूच किया
कैसे मंज़र थे मेरे घर के वो दहशत वाले
.
अभी तो देस हुआ था कोई परदेस मुझे
क्यों ख़याल आ रहे हैं ज़हन में हिजरत वाले
.
मैं किसी भीड़ का तन्हाई भरा चेहरा हूँ
मुझको पहचान नहीं पायेंगे सूरत वाले
.
उसकी यादों के सराबों से निकाला दरिया
जब भी सहरा में जुटे हम सी तबीअत वाले
.
उसकी आँखों के गिरफ़्तार की सुनवाई नहीं
केस लेते ही नहीं है ये अदालत वाले
.
यक ब यक आग लगी और धुआँ भरता गया
खिड़कियाँ खोल नहीं पाए इमारत वाले
.
बच तो जाते हैं कड़ी धूप से, बौछारों से
आसमाँ भूलने लगते हैं मगर छत वाले
.
फ़ैसला कोई ख़ुदा हमको सुनाएगा क्या ?
हमको मालूम है ये खेल क़यामत वाले
.
छोड़ जाएंगे हमें फिर से इसी जंगल में
हम फ़क़ीरों को कहाँ रक्खेंगे जन्नत वाले
.
कहीं भी चाक़, बदन, ख़ाक, ख़ला कुछ भी नहीं
इस्तिआरे मैं उठाऊंगा मुहब्बत वाले
.
कैसे शायर हो 'दिनेश' आपकी उलझन है अजब
क़ाफ़िये बाँध नहीं पाते हो हैरत वाले
दिनेश नायडू
No comments:
Post a Comment