सारा मंज़र मोम के जैसा पिघला था
सूरज मेरी आँख में आ कर डूबा था
सूरज मेरी आँख में आ कर डूबा था
ख़ाब का पस मेरी दुनिया में आता था
चाँद मेरी आँखों का कोई फोड़ा था
सुबह तो अच्छी क्लास लगाने वाली है
रात मेरे ख़ाबों ने गांजा फूँका था
क्या है इस दुनिया में मिलने के इमकान
मेरा हिज्र में मिट जाना इक तुक्का था
बीनाई का बल्ब बुझाने की थी देर
“रोशन मेरे घर का कोना-कोना था “
सिर्फ़ तुम्हारी तस्वीरें ही मिल पायीं
ग़म ने मेरे दिल पे छापा मारा था
फ़र्श पे मेरे बैंक के काग़ज़ बिखरे थे
छत से मेरे ख़्वाब का चेहरा लटका था
बस कम्बल दे पाया अपने बच्चे को
मेरी जान से महँगा घर का भाड़ा था
गाँव की सड़कें आज भी पाँव से लिपटी हैं
वो क्या दिन थे जब सब से मिल पाता था
हर किरदार कहानी का खुश रहता है
ऐसी गूँथी है हमने जीवन-गाथा
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