फिर नयी चौखट बनाने लग गई है आरज़ू
मेरा ख़स्ता घर सजाने लग गई है आरज़ू
मेरा ख़स्ता घर सजाने लग गई है आरज़ू
मैं अकेला रह गया था ज़िंदगी के दश्त में
दौड़ कर फिर मेरे शाने लग गई है आरज़ू
जैसे जैसे गहरी होती जा रही है ख़ामुशी
उतना ही ज़ोरों से गाने लग गई है आरज़ू
किस तरफ़ ले जायेगी मुझको न जाने राहे-शौक़
अब मेरी धड़कन बढ़ाने लग गई है आरज़ू
मुझमें सहरा के अलावा कुछ नहीं है फिर भी क्यूँ
मेरे अंदर ख़ाक उड़ाने लग गई है आरज़ू
इब्तिदा से ही न था इस टूटे दिल कुछ इलाज
आज क्यों आँसू बहाने लग गई है आरज़ू
अब किसी भी ख़त का मेरे वो नहीं देता जवाब
सो पुराना ख़त जलाने लग गई है आरज़ू
दो कदम ही तो चला था रहगुज़र पर दूसरी
देखिए वापस बुलाने लग गई है आरज़ू
कितने आलम बन के दिल में टूट जाते हैं "दिनेश"
क्यों ग़ज़ब का हश्र ढाने लग गई है आरज़ू
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