हमें मालूम है कैसा ख़सारा कर रहें हैं हम
गँवा दी उम्र हमने अपने दिल को दश्त करने में
और अब इस दश्त में अपना तुम्हारा कर रहे हैं हम
ये दरिया तुझ किनारे पर हमें आने नहीं देता
सो अब रो रो के इस दरिया को खारा कर रहें हैं हम
कभी तो हम दिवानों के जहाँ में रौशनी लौटे
न जाने कब से उस दर का नज़ारा कर रहे हैं हम
हर इक पहलू से हर मंज़र बरत कर देखने के बाद
ग़ज़ल में नाम उसका इस्तिआरा कर रहें हैं हम
फिर उसके बाद कोई और दुख दिल को नहीं भाया
सो पहला इश्क़ ही अपना दुबारा कर रहें हैं हम
टपकता ख़ून मिट्टी में मिले तो रंग उभरेंगे
सो इन गलियों के ज़र्रों को सितारा कर रहे हैं हम
कहाँ चलती है दिल की वहशतों के आगे अब अपनी
सो अब अपने ही दिल को पारा पारा कर रहें हैं हम
दिनेश नायडू
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