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Saturday, April 25, 2020

इश्क़ निकालेंगे इंकलाब से हम


नदी की सतह प उभरे हुए हुबाब से हम
बना रहें है तेरी शक्ल आज आब से हम

हमें तो वैसे भी दुनिया से कुछ शिकायत थी,
और अब तो थक भी चुके हैं दिले ख़राब से हम

हमें ये जंग किसी तौर ख़त्म करनी है
सो अब केे इश्क़ निकालेंगे इंकलाब से हम

समझ के सोच के हमको जवाब देना तुम
मआनी और निकालेंगे हर जवाब से हम

किसी की नीम वा आँखें तलाश करने में
ना रेज़ा रेज़ा बिखर जाएं ख़ाब ख़ाब से हम

वरक़ वरक़ तेरी खुशबू में भीगा जाता है
खुले हुए हैं तेरे सामने किताब से हम

उन्होंने देवता माना है हम से पत्थर को
डरे हुए हैं बहुत उनके इंतिख़ाब से हम

हमारे दोस्त भी दुश्मन से मिलने वाले हैं
ये जंग हार भी सकते है इस हिसाब से हम

दिनेश नायडू

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