रोने वाली आँखें देख के हँसता था
मंदिर के बाहर जो साधू बैठा था
मंदिर के बाहर जो साधू बैठा था
अपनी मस्ती में सर फोड़ा है हमने
इस दीवार को फांदा भी जा सकता था
हम फ़रियादी लोग हैं साहब छोड़ो भी
हमने बेध्यानी में तुम को पुकारा था
अब दुनिया के आगे नाक रगड़ता हूँ
मेरे आगे दश्त रगड़ता था माथा
बात मुकम्मल कैसे हो पाती मेरी
मेरा सानी मिसरा इतना अच्छा था
सहरा आकर सारी ग़फ़लत दूर हुई
जाने मैं किस धुन में घर से निकला था
बस मेरे अंदर फैली थी तारीकी
रोशन मेरे घर का कोना कोना था
खुश तो लगती थी जब मिलने आई थी
फिर क्यूँ उसकी आँख का काजल फैला था
दिल बहला के आख़िर लौट आया मैं ‘दिनेश’
उस महफ़िल में केवल मैं ही तन्हा था
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