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Monday, March 2, 2026

रोने वाली आँखें देख के हँसता था

रोने   वाली  आँखें  देख  के  हँसता था
मंदिर   के   बाहर   जो  साधू  बैठा  था

अपनी  मस्ती   में  सर  फोड़ा  है  हमने
इस  दीवार को फांदा भी जा सकता था

हम  फ़रियादी  लोग हैं साहब छोड़ो भी
हमने  बेध्यानी  में  तुम  को  पुकारा  था

अब   दुनिया  के आगे  नाक  रगड़ता हूँ
मेरे    आगे   दश्त   रगड़ता   था   माथा

बात    मुकम्मल  कैसे   हो   पाती  मेरी
मेरा  सानी   मिसरा   इतना  अच्छा  था

सहरा   आकर  सारी   ग़फ़लत  दूर  हुई
जाने  मैं  किस धुन में घर से निकला था

बस   मेरे   अंदर   फैली   थी   तारीकी
रोशन   मेरे   घर  का  कोना  कोना  था

खुश  तो लगती थी जब मिलने आई थी
फिर क्यूँ उसकी आँख का काजल फैला था

दिल  बहला के आख़िर लौट आया मैं ‘दिनेश’
उस  महफ़िल  में  केवल मैं ही तन्हा था

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