अगरचे ख़ुद से कोई दुश्मनी भी मेरी नहीं
जो बात करता है मुझसे वो दौर है ग़म का
मेरे बयान की शाइस्तगी भी मेरी नहीं
वो चीख़ते हुए अश्क़ों में डूबते चेहरे
ये लग रहा था मेरी ख़ुदकुशी भी मेरी नहीं !
किसी से मिलने बिछड़ने का सिलसिला है बस
तो इस हिसाब से ये ज़िन्दगी भी मेरी नहीं
पुकारते हुए किस दर प लौट आया हूँ
अब इसके आगे मेरी ख़ामुशी भी मेरी नहीं
बस उसके गीत सुनाने का एक ज़रिया हूँ
मेरे लबों पे रखी बांसुरी भी मेरी नहीं
उसी के रंग में हर रंग घुलता जाता है
मेरे जहान की ये तीरगी भी मेरी नहीं
उभरता है मेरे अंदर किसी का चाँद सा अक्स
ये मुझसे रिसती हुई रौशनी भी मेरी नहीं
दिनेश नायडू
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