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Friday, March 7, 2025

रात के ब्लेड से जब शाम का तन कटता है

रात के ब्लेड से जब शाम का तन कटता है 
एक पेपर की तरह नील गगन कटता है
 
तल्ख़ियाँ बढ़ती चली जातीं हैं धीरे धीरे
छोटी छोटी सी ही बातों से तो मन कटता है

ज़िन्दगी चुभती है मुझमें किसी शीशे की तरह
लम्हा लम्हा मेरा अंदर से बदन कटता है

गाँठ पड़ जाती है डोरी में अगर उलझन हो
बेसबब खींचते रहने से सुख़न कटता है 

डसता रहता है मुझे दिल का कड़ा सन्नाटा
क्या किसी वार से इस साँप का फन कटता है

कोई दीवार सी उठ जाती है घर के अंदर
एक भाई का जब इक भाई से फ़न कटता है

सुबह उठता हूँ तो रहता है लहू आँखों में
क्या मेरी नींद में ख़ाबों का बदन कटता है

ढाई मीटर में सिमट आई है पूरी दुनिया
बाप के सामने बच्चे का कफ़न कटता है

अब ये लगता है तेरा साथ कभी था ही नहीं
जैसे इक पल में ही जीवन का मिलन कटता है

ऐसा तारी है कोई ज़ख्म मेरे दिल पे दिनेश
सांस लेता हूँ तो लगता है की तन कटता है

दिनेश नायडू

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