सारे दरके हुए हिस्सों को छिपा लूँगा मैं
कैसी दुनिया है कोई ढंग न तरतीब कोई
अब तेरे ख़ाके में हर चीज़ बिठाऊंगा मैं
ऐसी पथराई हुई आँखें किसी काम की नईं
जब वो आएगा तो आँखों को बिछा दूंगा मैं
छूट जाते है सभी काम अधूरे मेरे
और यादों को तेरी मुँह न लगाऊंगा मैं
हर कोई मुझको तेरा हाल सुना बैठेगा
इस सलीक़े से तेरी बात निकालूंगा मैं
कैसे हो पाएगी तस्वीर मुकम्मल तेरी
ऐसी आँखों को कहाँ रूप दे पाऊंगा मैं
शेर दो चार तो कह लेने दो उन आँखों पर
आगे आगे नए मज़मूँ भी उठाऊंगा मैं
पहले दरिया को पहाड़ों से तो आज़ाद करूँ
फिर कहानी में समंदर को भी लाऊंगा मै
-दिनेश नायडू
वाह 👏👏👏👏
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