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Wednesday, March 5, 2025

अब मैं कुछ सोचता ही नहीं

तुझसे आगे बढ़ा ही नहीं
मुझको अपना पता ही नहीं

इश्क़ जैसी बला ही नहीं
ऐसी वहशत, इलाही नहीं !

अब क़लम में सियाही नहीं
कोई जलता दिया ही नहीं

बस ख़ला में भटकता रहा
मैं बदन में रहा ही नहीं

ज़िन्दगी भर किया जिससे वस्ल
मैंने उसको छुआ ही नहीं

किस तवक्को में गुज़री ये उम्र
मिल के भी वो मिला ही नहीं

ख़ाब को कहकशाँ कर लिया
मैं ज़मीं का हुआ ही नहीं

आसमाँ तक पहुँच थी मेरी
घर से बाहर गया ही नहीं

क़ुमक़ुमे बुझ गए आँख के
अब उजाला बचा ही नहीं

चीख़ता रह गया एक मैं
क़ाफ़िला तो रुका ही नहीं

बेड़ियों की सदा है फ़क़त
अब मैं कुछ सोचता ही नहीं

आरज़ू, कोशिशें, ज़ख़्म, दर्द
सिलसिला टूटता ही नहीं

सिर्फ़ दिल है मेरे ख़ेमे में
एक भी और सिपाही नहीं

रायगाँ हो गई ज़िन्दगी
अब कोई मसअला ही नहीं

साहिबो! ये मेरा टूटना
कोई पहली तबाही नहीं

था वो मंज़र मेरे क़त्ल का
ऐसा जिसकी गवाही नहीं

घर में दीवारें उठती गईं
सांस लूँ अब हवा ही नहीं

कौन आएगा हमको पसंद
कोई इतना बुरा ही नहीं

मेरे आंसू कोई पोंछता
शह्र में कोई था ही नहीं

वक़्त की मार पैहम हुई
ज़िन्दगी क्यों कराही नहीं

है इधर ज़िन्दगी तुम उधर 
बीच का रास्ता ही नहीं

अब जहाँ को ख़ुदा चाहिए 
सिर्फ इक ज़लज़ला ही नहीं
 
दिनेश नायडू

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