बड़ा अजीब सा आलम है क्या किया जाये
मिलन का आख़िरी मौसम है क्या किया जाये
मिलन का आख़िरी मौसम है क्या किया जाये
अगर रुकी नहीं बारिश तो डूब जायेगा शहर
मगर ये दीदा-ए-पुर-नम है क्या किया जाये
हर एक बात पर आती है अब हँसी मुझको
हयात इक ग़मे-पैहम है, क्या किया जाये
तुम्हारे सामने मेरी अना का ये पर्दा
सफ़ेद रंग का परचम है क्या किया जाये
किसे दें दोष हम आवाज़ अपनी खोने का
ग़ज़ल हमारी ही मुब्हम है क्या किया जाये
कोई भी गा नहीं पाता है अब तराना-ए-इश्क़
दिलों का साज़ ही बेदम है क्या किया जाये
ज़रा भी काम नहीं आई मसख़री मेरी
हर एक शक्ल पे मातम है क्या किया जाये
जो घर से दूर निकल कर हुआ था ख़ुश वो शख़्स
‘अब अपने आपसे बरहम है क्या किया जाये’
मैं उसको याद नहीं करना चाहता हूँ ‘दिनेश’
मगर ये रात भी पूनम है क्या किया जाये
–दिनेश नायडू
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