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Sunday, May 3, 2020

एक तो दिल भी तार तार है और


एक तो दिल भी तार तार है और
ऐसी शामों में ग़म का वार है और

रात भर चीख़ गूँजती हैं यहाँ
क्या मेरे घर में कोई ग़ार है और

मेरी आँखों से तुझ सराब तलक
सिर्फ इतना ही रेगज़ार है और

ढेर कर तो चुका हूँ ख़ुद को मगर
मारक़ा एक आर पार है और

एक दरिया की ख़ुदकुशी तो है
क्या सिवा इसके आबशार है और

खिल उठे हैं बदन में ज़ख़्म तमाम
इससे बेहतर कोई बहार है और

आस बंधती प हर पुकार के बाद
एक टूटी हुई पुकार है और

सारे मंज़र हैं आँख का धोखा
बड़ी दुनिया नज़र के पार है और

उसने इगनोर कर दिया मुझको
कोई मुझसे बड़ा शिकार है और

-दिनेश नायडू

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