ऐसी शामों में ग़म का वार है और
रात भर चीख़ गूँजती हैं यहाँ
क्या मेरे घर में कोई ग़ार है और
मेरी आँखों से तुझ सराब तलक
सिर्फ इतना ही रेगज़ार है और
ढेर कर तो चुका हूँ ख़ुद को मगर
मारक़ा एक आर पार है और
एक दरिया की ख़ुदकुशी तो है
क्या सिवा इसके आबशार है और
खिल उठे हैं बदन में ज़ख़्म तमाम
इससे बेहतर कोई बहार है और
आस बंधती प हर पुकार के बाद
एक टूटी हुई पुकार है और
सारे मंज़र हैं आँख का धोखा
बड़ी दुनिया नज़र के पार है और
उसने इगनोर कर दिया मुझको
कोई मुझसे बड़ा शिकार है और
-दिनेश नायडू
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