साफ़ दिखला के पशेमान बहुत करता है
आइना अब मुझे हलकान बहुत करता है
आइना अब मुझे हलकान बहुत करता है
याद आता ही नहीं कौन है वो शख़्स मगर
ख़ाब में आ के परेशान बहुत करता है
क्यूँ अता करता है दीदार के मरहम मुझको
तू मेरे ज़ख्म का नुक़्सान बहुत करता है
मेरी ठोकर पे पड़ा रहता है मंज़िल का गुमाँ
ये जुनूँ रास्ता आसान बहुत करता है
घोल देगी तुझे इक दिन कहीं सन्नाटों में
जिस मुहब्बत का तू ऐलान बहुत करता है
गुफ़्तगू उससे भला कौन से मुँह से छेड़ूँ
पास आ के ही वो एहसान बहुत करता है
ख़ाब की तरह चमकता हुआ वो पूस का चाँद
अब मेरी रात को वीरान बहुत करता है
जाने किस शय की तमन्ना में धड़कता है दिल
कोशिशें जीने की बेजान बहुत करता है
ज़िंदगी और लिखूँ क्या तेरे बारे में बोल
तंग मुझको तेरा उन्वान बहुत करता है
अब किसी बात पे तेरी नहीं होती हैरत
ऐ मेरे दोस्त तू हैरान बहुत करता है
दिनेश नायडू
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