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Wednesday, November 19, 2025

रात-दिन अब हमें दिन रात से डर लगता है

रात-दिन अब हमें दिन रात से डर लगता है
ऐसा आलम है कि हर बात से डर लगता है 

इक गिरह खुलती है तो फंसती है इक और गिरह 
हमको दिल तेरे सवालात से डर लगता है 

मर न जायें कहीं हालात पे हँसते-हँसते 
ज़िंदगी तेरी खुराफ़ात से डर लगता है 

जीत के वास्ते क्या क्या न किया है तूने 
ज़िंदगी हमको तेरी मात से डर लगता है

काश मसरूफ़ रहें यूँ कि गुज़र जाये हयात
हमको ठहरे हुए लम्हात से डर लगता है

जान से मार दे चाहे मगर आँसू न बहा
दुश्मने-जाँ हमें जज़्बात से डर लगता है

मिन्नतें की थीं मुलाक़ात की जिससे उसको
अब बताना है मुलाक़ात से डर लगता है

डर नहीं लगता है दुनिया के तसव्वुर से हमें 
हमको अपने ही ख़यालात से डर लगता है 

आसमाँ में कहीं मिट्टी न बिखर जाये मेरी 
अपनी बढ़ती हुई औक़ात से डर लगता है

पिघला जाता है बदन मोम की मानिंद 'दिनेश'
हिज्र की रात में बरसात से डर लगता है

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