किसी की बुझती निगाहों में जल रहा हूँ मैं
सियाह रात का पैकर बदल रहा हूँ मैं
न जाने कौन मुझे खींचता है अपनी ओर
न जाने किसके इशारों पे चल रहा हूँ मैं
सियाह रात का पैकर बदल रहा हूँ मैं
न जाने कौन मुझे खींचता है अपनी ओर
न जाने किसके इशारों पे चल रहा हूँ मैं
ये क्या ग़ज़ब है कि उस शख़्स की तमन्ना को
तमाम करते हुए हाथ मल रहा हूँ मैं
दिमाग़ कह तो रहा है ख़मोश रहने को
पर उसके सामने हर राज़ उगल रहा हूँ मैं
रवाँ रहा मैं कई रोज़ अपनी आँखों से
अब अपने जिस्म के अंदर उबल रहा हूँ मैं
ज़रा सा वक़्त निकाल और कर दे मुझको तमाम
सुन ऐ हयात बहुत दिन से टल रहा हूँ मैं
तुम्हारी राह अंधेरे में खो गई थी कहीं
सो दिन के ढलते ही घर से निकल रहा हूँ मैं
पता है दोस्त मुझे ये डगर कठिन है बहुत
दयारे-इश्क़ में यूँ ही टहल रहा हूँ मैं
सहेज रक्खा है अब भी ज़बाँ की खुशबू को
बला का शोर है लेकिन ग़ज़ल रहा हूँ मैं
दिनेश नायडू
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