सैराब अभी दीदा ए नमनाक बहुत है
सहरा में उड़ाने के लिए ख़ाक बहुत है
सहरा में उड़ाने के लिए ख़ाक बहुत है
आता है उसे ज़ख्म लगाने का सलीक़ा
वो दुश्मने-जानी मेरा चालाक बहुत है
ऐसा नहीं कि बुझ गया है चाँद फ़लक से
दर-अस्ल मेरी रात ही ग़मनाक बहुत है
करता है वही बात जो दिल सुन नहीं पाता
ये ज़ोम मेरे सर का तो बेबाक बहुत है
गर चाक पे रक्खा तो बिगड़ जाऊँगा फौरन
मिट्टी मेरी मालिक अभी नमनाक बहुत है
हर रास्ता पैदा किया है वहम ने तेरे
वहशत का सफ़र दोस्त ख़तरनाक बहुत है
गंगा की तरह दीदा-ए-गिरिया भी है पावन
अश्कों ने मेरे तन को किया पाक बहुत है
वो देखो धरी रक्खी वहाँ ताक़ पे दुनिया
दीवाने की ख़ातिर दिले सद-चाक बहुत है
आ जा कि कोई फूल खिले सह्न में मेरे
चुभता मुझे ये आलमे-ख़ाशाक बहुत है
आँखों में तेरी काहकशाँ घुल रही है जान
तू एक ही तारा सरे-अफ़्लाक बहुत है
दिनेश नायडू
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