कभी मिलेंगे नहीं रास्ते हमारे जाँ
कि हम हैं एक ही दरिया के दो किनारे जाँ
कि हम हैं एक ही दरिया के दो किनारे जाँ
दुआ तो करते रहे सारी-सारी रात मगर
हमारे वास्ते टूटे नहीं सितारे जाँ
भटकती जाती है आवाज़ बाज़गश्तों में
अब ऐसे दश्त में कैसे कोई पुकारे जाँ
ख़ला में डूबती जाती है रहगुज़र मेरी
कहाँ बिखर गए हैं अब तेरे इशारे जाँ
सजाये बैठा हूँ पलकों पे हिज्र के लम्हे
मुझे हैं ज़ख्म तेरे जान से भी प्यारे जाँ
मैं थक गया हूँ तुझे ज़िंदगी निभाते हुए
अब और उठ नहीं पायेगा मुझसे बारे-जाँ
सुकून और कहीं मिल नहीं सकेगा हमें
तेरी गली में भटकते हैं मारे-मारे जाँ
एक एक कर के हर इक चीज़ टूट जाती है
दिनेश कुछ नहीं मिलता है करके कारे-जाँ
दिनेश नायडू
No comments:
Post a Comment