सबब न पूछ मेरी ख़ामुशी का... बात समझ
ज़रा सा बुझते हुए दिल की मुश्किलात समझ
ज़रा सा बुझते हुए दिल की मुश्किलात समझ
तेरा ही चेहरा रहा डबडबाई आंखों में
शबे -फ़िराक़ को तू मेरी चाँद-रात समझ
किसी अधूरी तमन्ना की इम्तिदाद थी बस
जिसे मैं जी रहा था उम्र भर हयात समझ
घड़ी घड़ी मेरी आँखों से पोंछ मत आँसू
तबाह हो चुकी है मेरी कायनात समझ
हर एक बात पे उसका ही ज़िक्र मत कर दिल
लगा के बैठी है ये शाम तुझ पे घात समझ
अब आ भी जा कि उखड़ जायेंगी मेरी साँसें
बदन जला रही है मेरा सर्द रात समझ
हर इक दिवाना मेरे पीछे आ रहा है दिनेश
मेरा जनाज़ा नहीं तू इसे बरात समझ
No comments:
Post a Comment