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Saturday, October 25, 2025

मुझसे गिर्या के नए रंग निकाले न गए

बंद दर खुल गए पर ज़ह्न से ताले न गए
मेरी आँखों से गए वक़्त के जाले न गए

इक दफ़ीना भी छुपा था मेरी गहराई में
क्यूँ मेरी तह में कभी तैरने वाले न गए

सुर्ख़ होता रहा आकाश नज़र बुझने तक
मुझसे गिर्या के नए रंग निकाले न गए

देख लो तुम भी हमें दोस्त सहारा दे कर
हम तो वो लोग हैं जो ख़ुद से संभाले न गए

मुझसे टकराते रहे मील के पत्थर आ कर
राह ठहरी रही पर पांव के छाले न गए

मेरे चेहरे से कभी अश्क की सीलन न गई
मैं वो गोशा हूँ जहाँ तेरे उजाले न गए

ज़िंदगी अब तो इजाज़त दो दमे-आख़िर है
रह गए हैं मेरे कुछ काम जो टाले न गए

पेट भरता रहा दुनिया के तग़ाफ़ुल से मेरा
हल्क़ से नीचे कभी मेरे निवाले न गए

दिनेश नायडू

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