बंद दर खुल गए पर ज़ह्न से ताले न गए
मेरी आँखों से गए वक़्त के जाले न गए
मेरी आँखों से गए वक़्त के जाले न गए
इक दफ़ीना भी छुपा था मेरी गहराई में
क्यूँ मेरी तह में कभी तैरने वाले न गए
सुर्ख़ होता रहा आकाश नज़र बुझने तक
मुझसे गिर्या के नए रंग निकाले न गए
देख लो तुम भी हमें दोस्त सहारा दे कर
हम तो वो लोग हैं जो ख़ुद से संभाले न गए
मुझसे टकराते रहे मील के पत्थर आ कर
राह ठहरी रही पर पांव के छाले न गए
मेरे चेहरे से कभी अश्क की सीलन न गई
मैं वो गोशा हूँ जहाँ तेरे उजाले न गए
ज़िंदगी अब तो इजाज़त दो दमे-आख़िर है
रह गए हैं मेरे कुछ काम जो टाले न गए
पेट भरता रहा दुनिया के तग़ाफ़ुल से मेरा
हल्क़ से नीचे कभी मेरे निवाले न गए
दिनेश नायडू
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