बाद दरिया के नज़र आया दुबारा दरिया
चश्मे-गिर्यां ने हर इक सम्त उभारा दरिया
चश्मे-गिर्यां ने हर इक सम्त उभारा दरिया
जगमगाती है बहुत ख़ून बहाती आँखें
बुझती रातों का हुआ जाता है तारा दरिया
उसके आँसू मेरी आँखों में चले आते हैं
और बन जाता है इस दिल का शरारा दरिया
एक मुद्दत से वो ठहरा है मेरी पलकों पर
फिर भी क्या प्यास बुझा पायेगा ख़ारा दरिया
मैंने ही ख़ाक उड़ाने से न फ़ुर्सत पाई
वर्ना सहरा में मुझे रोज़ पुकारा दरिया
अंदर अंदर ही भँवर बन के बिगड़ जाता है
ढूँढता रहता है अपना ही किनारा दरिया
देखने वाले हमें देख के ग़र्क़ाब हुए
इस तरह हमने किनारे पे गुज़ारा दरिया
मेरी आँखों में पिघल जाएगा सारा मंज़र
मेरी ग़ज़लों में समा जाएगा सारा दरिया
ऐसी क़िस्मत है कि हर तौर है ख़स्ता कश्ती
और इस डूबती कश्ती का सहारा दरिया
एक ही ज़ख्म को सौ बार रफ़ू करते हैं
बाँधने से नहीं बँधता है हमारा दरिया
खींचती रहती है हर मौज मुझे अपनी ओर
क्या "दिनेश" आपको करता है इशारा दरिया
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