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Tuesday, October 7, 2025

ये इंसान अपने कारावास की मीआद क्या जाने

भला टूटे हुए माँ-बाप की फ़रियाद क्या जाने
बला क्या क्या गुज़रती है कोई औलाद क्या जाने 

कोई ख़ाहिश कभी घर में नहीं टाली गई जिसकी 
वो बेटी ख़ुश नहीं रहती है क्यों दामाद क्या जाने

बड़ी मुश्किल से सैले-अश्क से इक लफ़्ज़ निकला है 
मैं कैसे बोल पाया हूँ मेरा नक़्क़ाद क्या जाने

उसे भी लौट कर घर में किसी का पेट भरना है
परिंदे क्यों फँसे हैं जाल में सय्याद क्या जाने

अभी जकड़ी हुईं हैं इसको ज़ंजीरें मुहब्बत की 
ये इंसान अपने कारावास की मीआद क्या जाने

तुझे आवाज़ देता फिरता रहता हूँ मेरे आका  
ये बंदा अब कहाँ से आएगी इमदाद क्या जाने

भले ही काट सकता है पहाड़ों को जुनूँ उसका 
मगर शीरी पे क्या क्या बीती है फ़रहाद क्या जाने 

बरसता जा रहा है ताज़ियाना उफ़ नहीं करता  
मैं क्यों हँसने लगा हूँ मौत पर जल्लाद क्या जाने 

हम अपनी चाक पे मिट्टी घुमाने लग गए यूँ ही 
हुआ हमसे भला कैसे "दिनेश" ईजाद क्या जाने 

दिनेश नायडू

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