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Sunday, October 12, 2025

क्या करें शाम ढले यार चले आते हैं

एक जाता है तो दो चार चले आते हैं 
तेरे दर पर तेरे बीमार चले आते हैं

हमने बंदो को तेरे रोका भी आने से मगर 
क्या करें फिर भी वो नाचार चले आते हैं 

क्या पता तेरी नज़र हम पे कभी पड़ जाये
इसलिए रोज़ ही दस बार चले आते हैं 

हमको मालूम है कितनी बुरी होती है शराब
क्या करें शाम ढले यार चले आते हैं

ग़मगुसारी ही कहीं जान न ले ले मेरी 
छींकता भी हूँ तो ग़म-ख़्वार चले आते हैं

फूल खिल उठते हैं होती है जहाँ से हिजरत
पाँव रखता हूँ जहाँ ख़ार चले आते हैं

रात का रंग कभी ठीक से चढ़ता ही नहीं 
यार ये ख़ाब तो बेकार चले आते हैं 

हम परिंदों को सदा दे के तो देखो सय्याद 
एक आवाज़ पे लाचार चले आते हैं 

इन दिनों आपके मक़्तल में नहीं है रौनक़
हम ही तन्हा हैं जो सरकार चले आते हैं

क़ैस! सहरा में तेरे ख़ूब सजी है महफ़िल 
जो भी हो जाते हैं मिस्मार चले आते हैं 

कोई भी काम नहीं है हमें वैसे तो "दिनेश"
हम तो बस घूमने बाज़ार चले आते हैं

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