एक जाता है तो दो चार चले आते हैं
तेरे दर पर तेरे बीमार चले आते हैं
तेरे दर पर तेरे बीमार चले आते हैं
हमने बंदो को तेरे रोका भी आने से मगर
क्या करें फिर भी वो नाचार चले आते हैं
क्या पता तेरी नज़र हम पे कभी पड़ जाये
इसलिए रोज़ ही दस बार चले आते हैं
हमको मालूम है कितनी बुरी होती है शराब
क्या करें शाम ढले यार चले आते हैं
ग़मगुसारी ही कहीं जान न ले ले मेरी
छींकता भी हूँ तो ग़म-ख़्वार चले आते हैं
फूल खिल उठते हैं होती है जहाँ से हिजरत
पाँव रखता हूँ जहाँ ख़ार चले आते हैं
रात का रंग कभी ठीक से चढ़ता ही नहीं
यार ये ख़ाब तो बेकार चले आते हैं
हम परिंदों को सदा दे के तो देखो सय्याद
एक आवाज़ पे लाचार चले आते हैं
इन दिनों आपके मक़्तल में नहीं है रौनक़
हम ही तन्हा हैं जो सरकार चले आते हैं
क़ैस! सहरा में तेरे ख़ूब सजी है महफ़िल
जो भी हो जाते हैं मिस्मार चले आते हैं
कोई भी काम नहीं है हमें वैसे तो "दिनेश"
हम तो बस घूमने बाज़ार चले आते हैं
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