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Sunday, October 5, 2025

घर में रहता हूँ मगर घर में नहीं रहता हूँ

घर में रहता हूँ मगर घर में नहीं रहता हूँ
कूज़ागर हो के भी पैकर में नहीं रहता हूँ
 
लौट जाता हूँ ख़लाओं के शबिस्तानों में 
रात-दिन जिस्म के दफ़्तर में नहीं रहता हूँ
 
तैरता रहता हूँ तालाब में बीनाई के
दीद में रह के भी मंज़र में नहीं रहता हूँ 

टिमटिमाता हूँ हर इक आँख में मोती की तरह 
हाँ मैं तारा हूँ पर अम्बर में नहीं रहता हूँ
 
तोड़ देता हूँ गुज़रते हुए लम्हों का निज़ाम 
दौरे-अय्याम के चक्कर में नहीं रहता हूँ 

टूट जाता हूँ दुआओं की बस इक चोट से मैं 
देवताओं सा मैं पत्थर में नहीं रहता हूँ 

भाग जाता हूँ मैं कमज़ोर क़बीले की तरफ़ 
देर तक एक ही लश्कर में नहीं रहता हूँ 

ऐसे तो लहर मेरी मुझमें ही रहती है "दिनेश"
पर छलकता हूँ तो गागर में नहीं रहता हूँ 

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