ख़ामुशी भी कभी एजाज़े बयां तक पहुँचे
काश ये ज़ब्ते-फ़ुगाँ आहो-फ़ुगाँ तक पहुंचे
काश ये ज़ब्ते-फ़ुगाँ आहो-फ़ुगाँ तक पहुंचे
हमको रास आई नहीं आबो-हवा सहरा की
मिन्नतें करते हुए कूचा ए जाँ तक पहुँचे
कोई रस्ता तो खुले दिल के निहाँ ख़ाने में
और बंदा ये तेरा दारे-अमाँ तक पहुँचे
उनकी आँखों से टपकने लगे मेरे अल्फ़ाज़
आख़िरी दम तो हम एजाज़े-बयाँ तक पहुँचे
सर क़लम हो नहीं जाये कहीं दुनिया तेरा
दिले सद-चाक अगर नोके-ज़बाँ तक पहुँचे
रात की गर्द में धुँधला गया क़ुत्बी तारा
इस बयाबाँ में भला कौन कहाँ तक पहुँचे
हम हैं वो टूटते तारे जो दुआ से तेरी
कहकशाँ छोड़ के आशोबे-जहाँ तक पहुँचे
यूँ पहुँचते हैं तेरे उन्स तक अशआर मेरे
जैसे प्यासा कोई सहरा में कुआँ तक पहुँचे
बेअमाँ शहर कभी राह में हाइल नहीं हो
एक टूटा हुआ इंसान मकाँ तक पहुँचे
न मैं अर्जुन हूँ न दुश्मन मेरा भाई है "दिनेश"
हाथ फिर किसलिए मेरे न कमाँ तक पहुँचे
दिनेश नायडू
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