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Monday, September 29, 2025

ख़ाब सी लड़की

यारों मेरी टांग न खींचो दिल का हाल सुनाने दो
कैसी थी वो ख़ाब सी लड़की आज मुझे बतलाने दो

पहली-पहली बारिश थी जब उसको मैंने देखा था 
रिम-झिम करती उसकी आँखें जैसे हो पैमाने दो 

उसके तन से मिट्टी की सौंधी सी ख़ुशबू आती थी 
फेर के ज़ुल्फ़ पे हाथ सबा कहती थी मुझे सुलझाने दो

उसकी आँख का काजल बनती जाती थीं काली रातें
उसको देख के सुब्हें बोला करती थीं अलसाने दो

पाँव जहाँ रखती थी यारों फूल वहाँ खिल उठते थे 
उससे लिपट के चंपा-चमेली कहती थीं इतराने दो

मैं भी उसके दर पर अक्सर टेक लगाने जाता था
मन में अपने बुन लेता था मिलने के अफ़साने दो 

इक पर्ची में दिल की बातें लिख कर मिलने जाता था 
उसकी सहेली हँस के मुझको कहती थी...परवाने दो

उसकी आँखें बातें पढ़ कर कितनी बड़ी हो जाती थी 
आगे...आगे बतलाता हूँ ...थोड़ा तो सुस्ताने दो 

मीठी मीठी यादों में वो मीठा मीठा चेहरा है 
देख के मुझको कहता था जो...ख़ैर चलो अब जाने दो 

अब भी ख़ाब में आती है वो ख़ाब सी लड़की रोज़ाना
अब भी ख़ाब में मिलते रहते हैं यारों ..दीवाने दो

बीते वक़्त के बीते क़िस्से अब तो है बेकार "दिनेश"
सुब्ह के होते ही फिर से जग जायेंगे.. अनजाने दो

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