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Monday, September 29, 2025

इक राब्ता है जिसको मैं ज़ंजीर कर चुका

ग़ज़लों में अपने दर्द की तफ़्सीर कर चुका
मैं कब का अपने अश्क को तस्वीर कर चुका

पहनी हुई है जिस्म ने पोशीदा बेड़ियाँ 
इक राब्ता है जिसको मैं ज़ंजीर कर चुका

अब साहिबो ! जहान ही आएगा मुझसे तंग
मैं अपनी मुश्किलात की तदबीर कर चुका 

चुभ जाए मेरी बात तो मेरा नहीं कुसूर
लहजे को मेरे वक़्त ही शमशीर कर चुका 

सोने दो मुझको चैन से आवाज़ मत करो
ऐ ज़िन्दगी मैं आख़िरी तक़रीर कर चुका  

फिर क्यों पुकारता है मुझे शहरे-आरज़ू 
मैं अपने रेगज़ार की तामीर कर चुका 

अब ज़ख्म भर भी जाय तो चैन आएगा नहीं 
तेरा फ़िराक़ रूह पे तासीर कर चुका

जो एक बार नज़्म किया भूल जाता हूँ 
पढ़ता नहीं हूँ जो कभी तहरीर कर चुका 

उसके ख़याल का नया पैकर है मेरा शेर 
हर इक बयान मीर तक़ी मीर कर चुका

अब क्या बिगाड़ सकती है दुनिया मेरा "दिनेश" 
वो हाल मेरा आलमे-तक़दीर कर चुका

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