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Monday, September 29, 2025

यार सहरा तो बहुत ख़ुश्क है दरिया भेजो

मेरी आँखों के लिए ओस का क़तरा भेजो
ऐ शबे-यास मुझे हिज्र का तोहफ़ा भेजो 

दिले-फ़रहाद से कहने लगे हैं नैन मेरे
यार सहरा तो बहुत ख़ुश्क है दरिया भेजो

दिल में बनते हुए बेअंत सराबों के लिए 
जाने-मन प्यास में भीगा हुआ सहरा भेजो

दोस्त ! अल्फाज़ मआनी ही बदल देते हैं 
इश्क़ में ख़त है अगर भेजना, कोरा भेजो

बुझती रातों में दुआ तैरती रहती है मेरी 
ऐ ख़ला ! अब तो मेरे वास्ते तारा भेजो

कब से आवाज़ लगाती है ये मौजे-तूफ़ाँ 
डूबने के लिए कोई तो सफ़ीना भेजो

क़िस्मत ऐसे तो गिला है नहीं तुमसे लेकिन 
धूप के साथ दरख़्तों का भी साया भेजो

ख़ाक ही ख़ाक नज़र आती है ताहद्दे-नज़र 
इश्क़ ! इस दश्त में अपना कोई बंदा भेजो

देख के मुझको न मायूस हो दीवाना कोई 
कूचा ए यार से अब मेरा जनाज़ा भेजो 

इन दिनों तुमसे शिकायत नहीं करता हूँ "दिनेश"
तुम मुझे अपने जहाँ से ना यूँ रुसवा भेजो

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