ऐन मुमकिन है कि इक उम्र का सदमा हो जांउ
मैं किसी रोज़ अगर आप में ज़िंदा हो जांउ
मैं किसी रोज़ अगर आप में ज़िंदा हो जांउ
ख़ूँ बहाती हुईं आंखों को ना मिल पाई राह
अब की बारिश में मेरा जी है कि दरिया हो जांउ
मेज़ पर रक्खी हुई बूढ़ी किताबों की तरह
मैं तेरे ज़ह्न में मुमकिन है कभी वा हो जांउ
मन में बैठा हुआ रहता है तेरे जाने का वहम
अब यही ठीक है जानां कि मैं तन्हा हो जांउ
हर घड़ी एक नए जिस्म में ढलती है ख़ाक
मैं कहीं अपनी ही मिट्टी से ना मैला हो जांउ
चाक पर घूमता रहता हूँ इसी हसरत में
तू कभी हाथ लगाये तो मैं पूरा हो जांउ
और कितना मैं बहारों को रचाऊँ मेरी जान
अब तेरी धूप पड़े और मैं पीला हो जांउ
चाहता तो हूँ तेरा दिल नहीं दुःख पाये पर
मुझको मालूम नहीं रहता है मैं क्या हो जांउ
तेरा उतरा हुआ चेहरा मुझे चुभता है बहुत
क्या पता तुझको मनाने में मैं गुस्सा हो जांउ
तुम सदा देते रहो शहरे-ख़मोशाँ में "दिनेश"
जाने किस मौन के कतरे से मैं पैदा हो जांउ
दिनेश नायडू
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