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Saturday, September 27, 2025

मैं किसी रोज़ अगर आप में ज़िंदा हो जांउ

ऐन मुमकिन है कि इक उम्र का सदमा हो जांउ
मैं किसी रोज़ अगर आप में ज़िंदा हो जांउ 

ख़ूँ बहाती हुईं आंखों को ना मिल पाई राह 
अब की बारिश में मेरा जी है कि दरिया हो जांउ

मेज़ पर रक्खी हुई बूढ़ी किताबों की तरह
मैं तेरे ज़ह्न में मुमकिन है कभी वा हो जांउ 

मन में बैठा हुआ रहता है तेरे जाने का वहम 
अब यही ठीक है जानां कि मैं तन्हा हो जांउ 

हर घड़ी एक नए जिस्म में ढलती है ख़ाक
मैं कहीं अपनी ही मिट्टी से ना मैला हो जांउ

चाक पर घूमता रहता हूँ इसी हसरत में 
तू कभी हाथ लगाये तो मैं पूरा हो जांउ

और कितना मैं बहारों को रचाऊँ मेरी जान 
अब तेरी धूप पड़े और मैं पीला हो जांउ

चाहता तो हूँ तेरा दिल नहीं दुःख पाये पर 
मुझको मालूम नहीं रहता है मैं क्या हो जांउ

तेरा उतरा हुआ चेहरा मुझे चुभता है बहुत
क्या पता तुझको मनाने में मैं गुस्सा हो जांउ

तुम सदा देते रहो शहरे-ख़मोशाँ में "दिनेश" 
जाने किस मौन के कतरे से मैं पैदा हो जांउ

दिनेश नायडू 

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