सुन रहा हूँ ख़्वाब की नौहा-ओ-ज़ारी हाय हाय
कबसे है आँखों के आगे रात तारी हाय हाय
कबसे है आँखों के आगे रात तारी हाय हाय
ज़िन्दगी तूने तो दुनिया को चुना मेरी जगह
किसकी ख़ातिर मैंने अपनी जान वारी हाय हाय
पीटती रहती है छाती देखकर मुझको फ़ज़ा
हर तरफ़ फैली हुई है सोगवारी हाय हाय
कोई भी मौसम हरा रहता नहीं है देर तक
टूटते जाते हैं पत्ते बारी-बारी हाय हाय
मेरी मिट्टी धूल बनकर खो रही है दश्त में
ख़ाक ही कर देगी मुझको ख़ाकसारी हाय हाय
घूरता रहता है मुझको अक्स तेरा दूर से
चीख़ती रहती है मुझ पर बेक़रारी हाय हाय
रेज़ा-रेज़ा टूटता जाता है इक शहरे-निगार
होती रहती है मुसल्सल संगबारी हाय हाय
एक रिश्ते को बचाने के लिये सोचो ‘दिनेश’
“उठ गई दुनिया से राहो-रस्मे-यारी हाय हाय”
दिनेश नायडू
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