मेरी आँखों के रहे ख़ाली ही कासे साहब
फर्क़ पड़ता है कहाँ मेरी सदा से साहब
फर्क़ पड़ता है कहाँ मेरी सदा से साहब
हर घड़ी पांव दबाता हूँ तुम्हारी ज़िद के
कुछ भी होता नहीं है मेरी रज़ा से साहब
हैसियत क्या है मेरी आपके आगे बोलो
मुझको आज़ाद करो अपनी सज़ा से साहब
टूट जाता है सिपर सब्र का नाचारी से
ज़िंदगी जीत ही जाती है अना से साहब
क्या कोई शहरे-ख़मोशाँ है हमारे घर में
बात होती है फ़क़त आहो बुका से साहब
खिड़कियाँ बजती हैं कानों में मेरे सारी रात
गुफ़्तगू करती हैं शमएँ भी हवा से साहब
फ़स्ले-गुल मेरी निगाहों में खटकता है बहुत
क्यूँ ख़िज़ाँ जाती नहीं मेरी फ़ज़ा से साहब
दिनेश नायडू
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