Translate

Monday, September 22, 2025

गुफ़्तगू करती हैं शमएँ भी हवा से साहब

मेरी आँखों के रहे ख़ाली ही कासे साहब 
फर्क़ पड़ता है कहाँ मेरी सदा से साहब

हर घड़ी पांव दबाता हूँ तुम्हारी ज़िद के
कुछ भी होता नहीं है मेरी रज़ा से साहब
 
हैसियत क्या है मेरी आपके आगे बोलो 
मुझको आज़ाद करो अपनी सज़ा से साहब 

टूट जाता है सिपर सब्र का नाचारी से
ज़िंदगी जीत ही जाती है अना से साहब

क्या कोई शहरे-ख़मोशाँ है हमारे घर में 
बात होती है फ़क़त आहो बुका से साहब

खिड़कियाँ बजती हैं कानों में मेरे सारी रात
गुफ़्तगू करती हैं शमएँ भी हवा से साहब 

फ़स्ले-गुल मेरी निगाहों में खटकता है बहुत 
क्यूँ ख़िज़ाँ जाती नहीं मेरी फ़ज़ा से साहब 

दिनेश नायडू

No comments:

Post a Comment