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Monday, September 22, 2025

मेरी नसों को तेरी हथकड़ी ने काट दिया

दिलों को जोड़ता धागा ख़ुदी ने काट दिया
मेरा लगाव तेरी बेरुख़ी ने काट दिया

फफक-फफक के घटा मेरे साथ रोने लगी
लो आसमाँ भी मेरी ख़स्तगी ने काट दिया

हमारी आँख से बहता रहा गुलों का लहू
बहारे-नौ को तुम्हारी कमी ने काट दिया

रिहा हुआ मैं तेरी क़ैद से हयात आख़िर
मेरी नसों को तेरी हथकड़ी ने काट दिया

शुरूअ होगा यहीं से दयारे-सहरा अब
नदी का रस्ता मेरी तिश्नगी ने काट दिया

मुझे लगा था भटक जाऊँगा मैं सहरा में
‘ये रास्ता मेरी आवारगी ने काट दिया’

फिर उसकी बज़्म में ता-देर क़हक़हे गूँजे
जो मेरी बात को उसकी हँसी ने काट दिया

वो सर झुकाये हुए बैठा है मेरे आगे
अना के वार को शाइस्तगी ने काट दिया

यही तो है मेरे इज़हार का उरूज ‘दिनेश’
बला का शोर मेरी ख़ामुशी ने काट दिया

दिनेश नायडू

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