हमारी आँख में अश्क और ख़ाब दोनों हों
तलब के वास्ते आबो-हुबाब दोनों हों
तलब के वास्ते आबो-हुबाब दोनों हों
मैं डूब जाऊँ कभी तो कभी उड़ाऊं ख़ाक
दयारे-जाँ में नदी और सराब दोनों हों
बस एक रंग में क्यूँ देखता रहूँ दुनिया
मेरे नसीब में अच्छा ख़राब दोनों हों
नहीं हुई थी तब उम्र अपनी इश्क़ की शायद
ये भी हो सकता है बस ख़ाब-ख़ाब दोनों हों
दिखाई देता रहे चाँद मुझको बादल में
तुम्हारा हुस्न तुम्हारा हिजाब दोनों हों
मैं चांद रात के पर्दे से धूप को देखूँ
मेरे फ़लक पे क़मर आफ़ताब दोनो हों
चुना है किस लिये रस्मो-रिवाज का रस्ता
जब अहद ऐसा था ख़ाना ख़राब दोनों हों
दिनेश नायडू
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