हवा पे नाम लिखा और फिर मिटाया भी
मैं अपने ख़ाब पे थोड़ा सा चिड़चिड़ाया भी
मैं अपने ख़ाब पे थोड़ा सा चिड़चिड़ाया भी
ये दिन तो जैसे किसी रात की सियाही है
दिखाई देता नहीं है कहीं पे साया भी
ना सिलसिला-ए-शबो-रोज़ तोड़ पाया मैं
कभी चराग़ जलाया कभी बुझाया भी
कहीं भी जी नहीं लगता है आजकल मेरा
मैं तेरे याद के जंगल में घूम आया भी
उस एक रब्त को हर ढंग से निभाता रहा
वही है अपना मेरा और वही पराया भी
लिखा नहीं है जो क़िस्मत में उसका क्या रोना
हमारे हाथ से बिगड़ा बना बनाया भी
तमाम उम्र तेरे साथ ही बिताई मगर
कभी ये लगता है क्या तुझको जान पाया भी
तुझे ही साथ गंवारा नहीं था मेरा 'दिनेश'
कभी कभी तो तेरे आगे गिड़गिड़ाया भी
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