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Monday, July 14, 2025

वही है अपना मेरा और वही पराया भी

हवा पे नाम लिखा और फिर मिटाया भी 
मैं अपने ख़ाब पे थोड़ा सा चिड़चिड़ाया भी 

ये दिन तो जैसे किसी रात की सियाही है 
दिखाई देता नहीं है कहीं पे साया भी 

ना सिलसिला-ए-शबो-रोज़ तोड़ पाया मैं 
कभी चराग़ जलाया कभी बुझाया भी

कहीं भी जी नहीं लगता है आजकल मेरा 
मैं तेरे याद के जंगल में घूम आया भी 

उस एक रब्त को हर ढंग से निभाता रहा 
वही है अपना मेरा और वही पराया भी

लिखा नहीं है जो क़िस्मत में उसका क्या रोना 
हमारे हाथ से बिगड़ा बना बनाया भी

तमाम उम्र तेरे साथ ही बिताई मगर 
कभी ये लगता है क्या तुझको जान पाया भी 

तुझे ही साथ गंवारा नहीं था मेरा 'दिनेश'
कभी कभी तो तेरे आगे गिड़गिड़ाया भी

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