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Monday, June 9, 2025

अब कोई जिस्म बन गया होगा

तरही ग़ज़ल 1

बर्फ़ की तह में दब गया होगा
चीड़  का  पेड़  है,  हरा  होगा 

देख  कर आना सर्द मौसम है
मुझमें कुहरा बहुत घना होगा

उसके रंगों में  घुल  के मेरा रंग
तीसरा  रंग   हो   चुका   होगा

किसके ख़ाबों से रात घायल है
कौन   शबख़ून   मारता   होगा

वो   भी   होगा  तबाह  छूने  से
मुझमें  जो  भी बचा खुचा होगा

रौशनी   रक़्स  में  थी  पूरी रात
कौन  इतना   जला-बुझा  होगा

मुझसे रिसता हुआ अकेलापन
अब कोई जिस्म बन गया होगा

ज़िन्दगी   एकरस   कहानी   है
‘ख़ाब    होंगे  न  काफ़्का होगा’

काश  सहरा  में और होते क़ैस
सिर्फ़  मेरे  जुनूँ  से  क्या  होगा

कब का फ़रहाद हो चुका है ‘दिनेश’
रेत …  पानी    बना    रहा    होगा

तरही ग़ज़ल 2

अब  नहीं  जानता  कि क्या होगा
पर  ये  तय  है कि मोजिज़ा होगा

वो  जो   पत्थर था  राह का मेरी
किसने   सोचा  था  देवता  होगा

मुझको पूरा यक़ीं है क़िस्मत पर
मेरे   हिस्से    में   हादसा   होगा

साहिबे-दश्त   मैं   ही   हूँ  प्यारे
सर  पटक  लूँ  तो दश्त वा होगा

बैठ   जाता   है   मेरे  कांधे  पर
इश्क़   बेताल   हो   गया  होगा

एक  टुकड़ा  ज़मीन की ख़ातिर
आसमां    टूटता    रहा    होगा

ख़ुद को मिस्मार करना पड़ता है
ज़लज़ला  ऐसे  ज़लज़ला  होगा

इसको रोटी नहीं खिलाओ मियाँ
‘कल   सगे-दहर   भेड़िया  होगा’

पढ़   रहे  हैं  निसाबे  दुनिया हम
अब  ‘दिनेश’ आँख फोड़ना होगा

तरही ग़ज़ल 3

खुल    रहा   रौज़ने-सदा   होगा
मेरे    अंदर   सुकूत   वा   होगा

सारे   दर   मुझपे  बंद होने लगे
खटखटाना   दरे-निदा     होगा

फूल  तो  सूख  जाएंगे इक दिन
क्या पता  क्या रुख़े-सबा  होगा

मैंने   सोचा   नहीं  था जाने-जाँ
तेरा दुःख इतना जाँ-फ़िज़ा होगा

रौशनी  लौट  जायेगी  इक दिन
जिस्म  इक  पैकरे-हवा   होगा

तल्ख़ियाँ झड़  रही  हैं  होठों से
ये  भी इक लहजा-ए-दुआ होगा

झोंपड़ी   तोड़    दी   गई   होगी
और  वो  फुटपाथ बन गया होगा

दिनेश नायडू

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