कब से शुआ-ए-ख़ाक में लिपटा हुआ है जिस्म
मैंने जो एक उम्र से पहना हुआ है जिस्म
सिमटा हुआ पड़ा हूँ कहीं अपनी ज़ात में
शीशे की तरह टूट के बिखरा हुआ है जिस्म
सुलगा हुआ है मुझमें तेरी यास का अलाव
अब भी तेरे ही लम्स में पिघला हुआ है जिस्म
बिस्तर की सिलवटों में नज़र आ रहे हैं ख़ाब
कोने में फ़र्श के कहीं उतरा हुआ है जिस्म
ख़त पढ़ रही है आख़िरी कमरे में एक लाश
पँखे से उसकी याद का लटका हुआ है जिस्म
आँसू में घुल रही हैं गए दिन की अस्थियाँ
गंगा के तट पे आज भी जलता हुआ है जिस्म
खिड़की से दिख रही है ख़लाओं से गहरी रात
अंदर मकाँ के मोम सा गलता हुआ है जिस्म
होठों से मेरे उठने लगा मौत का धुंआ
सिगरट की तरह हाथ में सुलगा हुआ है जिस्म
अब जा के वस्ल होने को है आग से दिनेश
कब से हमारा नूर से बिछड़ा हुआ है जिस्म
दिनेश नायडू
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