मैं हूँ मंज़र से, मनाज़िर मुझसे
हैं सभी रंगे-मुसव्विर मुझसे
हैं सभी रंगे-मुसव्विर मुझसे
मैं ही फोड़ा करूँ क्यूँ अपना सर
तू भी दीवार कभी गिर मुझसे
कर लिया ख़ुद को दुबारा तस्लीम
ज़िंदगी जीत गई फिर मुझसे
सुर्ख़ आँखों से धुआँ उठता है
रोशनी होती है ज़ाहिर मुझसे
सूख कर ख़ूँ ही रफ़ू करने लगा
ज़ख़्म भी थक गया आख़िर मुझसे
जब भी दुनिया ने बुलाया मुझको
एक सहरा हुआ हाज़िर मुझसे
काट कर जोड़ता है फिर मुझको
क्या भरम रचता है साहिर मुझसे
इस तरह ख़ाक उड़ाऊँगा 'दिनेश'
राह पूछेंगे मुसाफ़िर मुझसे
दिनेश नायडू
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