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Tuesday, June 10, 2025

ज़िंदगी मौत का दफ़्तर है दोस्त

ये मेरा ख़ाब सा जो घर है दोस्त 
हो रहा बिन तेरे जर्जर है दोस्त

अपने ख़ाबों की अधूरी दुनिया 
अब हक़ीक़त से भी बदतर है दोस्त 

ख़ाक होने की हैं साँसें तनख़्वाह  
ज़िंदगी मौत का दफ़्तर है दोस्त 

जिसको तुम ढूँढ रहे हो हर सम्त 
दश्त वो मेरे ही अंदर है दोस्त

शेर लाई है नया शामे-फ़िराक़ 
आपका दर्द मुकर्रर है दोस्त

मैंने ही कर दिया है ख़ुद को तर्क
भूल जाना मुझे बेहतर है दोस्त

भर भी सकता है तेरा ज़ख़्म इक दिन 
बस इसी बात का तो डर है दोस्त 

मैं वही दोस्त हूँ तेरा जानी 
जो भी कुछ है तेरे भीतर है दोस्त 

कोई ख़तरा नहीं है उससे 'दिनेश' 
दुश्मने-जाँ है मेरा, पर है दोस्त

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