उसके धुँधले अक्स को थोड़ा सा कम धुँधला करे
यूँ ही छोटी सी ख़ुशी से ज़िंदगी बहला करे
यूँ ही छोटी सी ख़ुशी से ज़िंदगी बहला करे
किसलिए बस पांव के नीचे से ही खिसके ज़मीं
आसमाँ से भी कोई मेरी तरफ़ हमला करे
ख़ुद ब ख़ुद अशआर में ढल जाय मेरी ख़ामुशी
शाम मेरी शायरी की आँच से पिघला करे
मुझसे मिलने आये उसकी चांदनी बन कर ख़ला
पूस का ये चाँद मुझको और भी उजला करे
सिर्फ़ साया ही बनाये क्यूँ हमारे इर्द-गिर्द
आग हम पर किसलिये सूरज नहीं उगला करे
एक ही दुःख कब तलक देता रहे धड़का हमें
क्यूँ न हर इक बात पर दिल-ज़ार अब दहला करे
अब गले तक आ गया है पानियों का सिलसिला
कोई आ कर आंसुओं की झील को उथला करे
बेख़ुदी में रास्ता कटता चला जाये मेरा
काश हर मंज़र पे मेरी ज़िंदगी फिसला करे
उल्टी जानिब घूमती जाये घड़ी की सूइयाँ
मेरे इस अगले क़दम को वक़्त फिर पिछला करे
No comments:
Post a Comment