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Tuesday, June 10, 2025

ग़ज़ल पे मेरी कोई तब्सिरा नहीं करना

दुआ-ए-ख़ैर कोई फ़ातिहा नहीं करना
मैं सोने वाला हूँ यारों सदा नहीं करना

हमारे हाल पे उफ़ तक नहीं किया तुमने 
हमारी मौत पे आहो-बुका नहीं करना 

ये अश्क अश्क नहीं ज़िंदगी का हासिल है 
मुझे अब और किसी से गिला नहीं करना

ये शायरी तो मुहब्बत की आहो-ज़ारी है
ग़ज़ल पे मेरी कोई तब्सिरा नहीं करना

इस इंतिशार का पहला मक़ाम इश्क़ है दोस्त 
अगर हो बस में कभी इब्तिदा नहीं करना

ज़रा सा वक़्त दो ज़ख़्मों को भर ही जाते हैं 
बिछड़ रहे हो मगर फ़ैसला नहीं करना 

दुआ सलाम कभी दूर से हो जाय तो ठीक 
वगरना हमको तेरा सामना नहीं करना 

अना से इश्क़ परे होगा पर दिवाने सुन 
किसी भी शख़्स को ख़ुद से बड़ा नहीं करना 

बस इल्तिजा है यही आख़िरी हमारी 'दिनेश' 
तुम अपना ज़ख़्म दुबारा हरा नहीं करना

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