बदन बदन नहीं है अश्क का पियाला है
सहर का रंग मेरे आसमाँ में काला है
सहर का रंग मेरे आसमाँ में काला है
मैं क्या कहूँ की टूट जाती है मेरी आवाज़
मेरा बयान मेरी ज़िन्दगी का नाला है
वफ़ा मिटा नहीं सकेगी बेवफ़ाई भी
कभी नहीं खुलेगा जो ज़बाँ पे ताला है
हर एक शै से चीख़ता है मुझ पे सन्नाटा
उदासियों का मेरे घर में बोलबाला है
मचा हुआ है मेरे दिल में शोर मातम का
तेरी ख़ामोशियों ने मुझको तोड़ डाला है
समय के साथ चश्मे-तर भी सूख जायेगी
ये ओस आख़िर एक सुब्ह का निवाला है
चमक रही है मेरी राख सुर्ख़ रंगों में
तुम्हारी तीरगी ने कर दिया उजाला है
घड़ी घड़ी हंसा रही है हमको मजबूरी
हमारी ख़स्तगी का तौर भी निराला है
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