इस बुझते हुए दिल की जलन को न जलाऊँ
सिग'रट की तरह अपने बदन को न जलाऊँ
सिग'रट की तरह अपने बदन को न जलाऊँ
जलता ही रहूँ मन की ख़लाओं में तमाम उम्र
माचिस से तेरी याद की मन को न जलाऊँ
वहशत में सुलगते हुए करता भी रहूँ रम
और नाचते-गाते हुए वन को न जलाऊँ
बस देखता रह जाऊं उजाले का बिखरना
अब जोड़ के शीशे से किरण को न जलाऊँ
क्या सिर्फ़ बहारों का ही तकता रहूँ रस्ता
सूखी हुई आँखों से चमन को न जलाऊँ
हो जाऊं भले अपने ही जज़्बात में मैं भस्म
कोशिश यही है अपने सुख़न को न जलाऊँ
केवल तेरी आगोश में दहका ही रहूँ जान
बर्फ़ीली हवाओं की तपन को न जलाऊँ
तकता ही रहूँ ताक़ पे रक्खा हुआ दीपक
बैठे हुए कमरे की घुटन को न जलाऊँ
दम घोंट तो सकता है धुंआ यास का मेरा
पर जी के 'दिनेश' अपनी चुभन को न जलाऊँ
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