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Wednesday, May 14, 2025

माचिस से तेरी याद की मन को न जलाऊँ

इस बुझते हुए दिल की जलन को न जलाऊँ
सिग'रट की तरह अपने बदन को न जलाऊँ 

जलता ही रहूँ मन की ख़लाओं में तमाम उम्र 
माचिस से तेरी याद की मन को न जलाऊँ

वहशत में सुलगते हुए करता भी रहूँ रम 
और नाचते-गाते हुए वन को न जलाऊँ

बस देखता रह जाऊं उजाले का बिखरना 
अब जोड़ के शीशे से किरण को न जलाऊँ 

क्या सिर्फ़ बहारों का ही तकता रहूँ रस्ता 
सूखी हुई आँखों से चमन को न जलाऊँ 

हो जाऊं भले अपने ही जज़्बात में मैं भस्म 
कोशिश यही है अपने सुख़न को न जलाऊँ 

केवल तेरी आगोश में दहका ही रहूँ जान
बर्फ़ीली हवाओं की तपन को न जलाऊँ 

तकता ही रहूँ ताक़ पे रक्खा हुआ दीपक 
बैठे हुए कमरे की घुटन को न जलाऊँ 

दम घोंट तो सकता है धुंआ यास का मेरा 
पर जी के 'दिनेश' अपनी चुभन को न जलाऊँ

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