एक दिल है..उसे भी शल कह कर
क्या मिलेगा मुझे ग़ज़ल कह कर
ख़ुद ही ग़ायब है क़ैस सहरा से
मुझको सहरा से "चल-निकल" कह कर
वो नहीं आता है कभी मिलने
टाल देता है आज..कल कह कर
हमसफ़र तुम भी हमसफ़र हो भले
रोक रक्खा है, साथ चल कह कर
फिर वो मिट्टी मुझे निगलती गई
एक खिलता हुआ कँवल कह कर
तूने मुश्किल बढ़ा दी मेरी जान
मुश्किलों को मेरी सरल कह कर
डॉक्टर भी ज़रा उदास हुआ
मेरी दुनिया है कोई छल कह कर
करती रहती है ज़िन्दगी तफ़्तीश
कैसे ज़िंदा है राज़ उगल कह कर
दिनेश नायडू
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