इस राहे-अज़िय्यत से विदाई नहीं देता
मेरा ही बदन मुझको रिहाई नहीं देता
ऐनक लगा के देखता हूँ दूर की चीज़ें
जो सामने रहता है दिखाई नहीं देता
इससे तो भले थे मेरे महरूमियों के दिन
अब कोई मुझे दिल से बधाई नहीं देता
सच बोलने से क़ब्ल ज़रा सोचता तो हूँ
कहने के ब'आद अपनी सफ़ाई नहीं देता
उसके लिए ही मैंने उठाई है ये तलवार
क्यों मेरी गवाही मेरा भाई नहीं देता
जुंबिश लबों की तेरी नज़र आ तो रही है
क्या बोल रहा है तू सुनाई नहीं देता
झुलसा रही थी धूप जुदाई की जून तक
अब दिन बिना बारिश के जुलाई नहीं देता
रोटी कमा के लाता है उस रोज़ भी मुफ़लिस
त्यौहार पे बच्चों को मिठाई नहीं देता
चुपचाप गुज़र जाता हूँ गलियों से तुम्हारी
मैं अपनी वफाओं की दुहाई नहीं देता
हम बेसरो-सामाँ हैं 'दिनेश' आने को तैयार
आवाज़ मगर शहरे-'भिलाई' नहीं देता
No comments:
Post a Comment