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Tuesday, May 6, 2025

शाम ख़ुश्बू पहन कर आती है

धूप पेड़ों से छन कर आती है
चांदनी छाँव बन कर आती है

मुझमें यादों के फूल खिलते हैं
शाम ख़ुश्बू पहन कर आती है

ध्यान लगता है जैसे ही जमने
उसकी पायल झनन कर आती है

गोलियां भी असर नहीं करतीं 
नींद लाखों जतन कराती है

मंजर आँखों में तोड़ लेता हूँ
एक नद्दी उफ़न कर आती है

अब्र को छू के उसकी बादे-सबा
मुझमें बरसात बन कर आती है

मेरी ख़ल्वत में रोज़ उसकी तलब
ख़ाब को तन-बदन कर आती है

ख़ुदकुशी भी अजीब शय है 'दिनेश'
और जीने का मन कराती है

दिनेश नायडू

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