ग़ज़ल 1
दरख़्ते-बाग़े-सुखन बेसमर बनाती हुई
बहारे-दिल ही मुझे बेहुनर बनाती हुई
तेरे बदन को हवा छू के आई है मुझ तक
नये-नये मेरे दिल में कलर बनाती हुई
रक़ीब देख रहे हैं मुझे मलाल के साथ
“निगाहे-नाज़ मुझे मोतबर बनाती हुई”
तेरी क़बूल तलक भी पहुँच ही जायेगी बात
अभी तो छेड़ी है मैंने ‘अगर’ बनाती हुई
लगा नहीं था कभी होगी मुझको घबराहट
मगर तुम्हारी तलब मुझमें डर बनाती हुई
सदा मैं ज़ात में रहता था बंद-बंद मियां
किसी की कुन फ़यकुन मुझमें दर बनाती हुई
ग़ज़ल के शेरों में घुल जाती है तेरी ख़ुशबू
मेरी सियाही को आख़िर क़मर बनाती हुई
नज़र के कोने पे इक शक्ल सी उभरती है
मेरी निगाह को ख़ूने-जिगर बनाती हुई
उदास रात पे यादों की बर्फ़ पड़ती है
तमाम सर्द फ़ज़ा सर्द-तर बनाती हुई
मैं अपनी छाँव से कब का ही मिट गया होता
किसी की धूप है मुझको शजर बनाती हुई
या उसके दर पे मुसलसल घना अंधेरा था
या रौशनी थी मुझे बेनज़र बनाती हुई
चहक रही है फ़िज़ाओं में उसकी बादे-सबा
हमारे मन की नदी में भंवर बनाती हुई
कभी हुई मेरी तख़लीक़ तुझसे ऐ दुनिया ?
कि थक गई है मुझे चाक पर बनाती हुई
ख़मोश आब में धुंधला गई तेरी तस्वीर
हमारे अश्कों की बस बूँद भर बनाती हुई
ये ज़िन्दगी तो है शामे-अबद के बाद की रात
बदन की बुझती हुई लौ अमर बनाती हुई
हवस की एक फ़ज़ा बन गई है दुनिया में
इस आदमी को फिर इक जानवर बनाती हुई
ख़मोशी तेरी मेरे दिल को चीरती है “दिनेश”
तेरे ही ज़ख्म को और सुर्ख़-तर बनाती हुई
क़िता:
कहाँ गई मेरे आँगन से फूल सी बच्ची
जो घूमती थी परिंदों का घर बनाती हुई
न जाने कैसे बड़ी हो गयी अचानक से
वो अपनी कॉपी में तितली के पर बनाती हुई
ग़ज़ल:
हर इक पड़ाव मिरा रहगुज़र बनाती हुई
अजीब तरह वो नक़्शे-सफ़र बनाती हुई
मैं अपनी ज़िद में पहाड़ों की ओर जाता हुआ
वो दिल में सब्र का कोई शिखर बनाती हुई
मैं उसके वास्ते दुनिया से जंग लड़ता हुआ
मुझे वो अपनी महब्बत का दर बनाती हुई
मैं काँपता हुआ दहलीज़ पार करता हुआ
वो रस्म तोड़ के ख़ाबों का घर बनाती हुई
मैं उसके ख़ाब बुझाने में हिचकिचाता हुआ
वो अपनी रात से मेरी सहर बनाती हुई
मैं उसके लम्स से हर लम्हा भस्म होता हुआ
वो मुस्कुराते हुए मुझको घर बनाती हुई
ज़रा-ज़रा सा बिखरता हुआ मैं हर इक पल
वो लम्हा लम्हा मुझे जोड़ कर बनाती हुई
मैं उसके सामने नज़रे झुकाये बैठा हूँ
“निगाहे-नाज़ मुझे मोतबर बनाती हुई”
दिनेश नायडू
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