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Wednesday, April 9, 2025

हम अपनी रौशनी के साए रू ब रू करते

नहीं था होश कोई और आरज़ू करते 
तमाम उम्र गुज़ारी है ख़ुद को तू करते
 
ये ज़िन्दगी भी किसी तौर कट ही जायेगी 
दो चार काम वही अपने फ़ालतू करते 

गुज़िश्ता दिन की कहानी को नज़्म करते हैं 
हम अपनी शाम के पन्ने लहू-लहू करते

दिखाई देने लगा है वो सामने हमको 
भटक रहे हैं मगर फिर भी जुस्तजू करते 

तुम्हारे बारे में ऐ दोस्त भूल जाते हैं 
'हम और बुलबुले-बेताब गुफ़्तगू करते'

उसी तरह से गंवाते हर एक सपने को 
दुबारा ज़िन्दगी मिलती तो हू-ब-हू करते 

हमें ज़माना ख़राबा ही ठीक लगता था 
नहीं थी कोई तमन्ना कि कुछ रफ़ू करते 

सियाह रात के पहलू में बैठे रहते हैं 
हम अपनी रौशनी के साए रू ब रू करते

दिनेश नायडू 

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