हो न जाऊं मुतमइन घर-बार से
'ला दे इक जंगल मुझे बाज़ार से'
मारका तो सर ना कर पाया मगर
मेरी दुनिया कट गई तलवार से
फूल की ख़ुशबू नहीं मिल पाएगी
बस बदन लिपटे रहेंगे ख़ार से
आंसुओं से खींच सकता हूँ उफ़क़
नाप सकता हूँ ख़ला अशआर से
एक नुक़्ता रह गया है ज़ीस्त में
क्या चुरा लूँ तिल तेरे रुख़्सार से
बात वो इतनी बड़ी भी थी नहीं
बात करनी चाहिए थी यार से
कांच सा चुभते हैं मेरी ज़ात में
दिल जो टूटे थे मेरे पिंदार से
एक क़तरा ज़िन्दगी मुझमें भी थी
बुझ गई है रौशनी के वार से
दिनेश नायडू
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